सोशल मीडिया का सच: जो दिखता है, वो होता नही है

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सोशल मीडिया का सच: जो दिखता है, वो होता नही है

लेकिन जो हम पर्सनालिटी ऑनलाइन लोगों को दिखाते हैं और जो हम वास्तव में वह एक ही इंसान है? अक्सर इस सवाल का जवाब ना ही होता है । क्योंकि कभी-कभी हम असल जिंदगी में लोगों से बात करने में और अपनी भावनाएं लोगों को बताने में हिचकिचाते हैं कि लोग हमें जज ना करें इसे फेयर ऑफ जजमेंट भी कहते हैं। लेकिन ऑनलाइन दुनिया हमे फ्रीडम देती है कि हम बिना किसी डायरेक्ट जजमेंट के अपने विचार, फीलिंग्स और ओपिनियन शेयर कर सकते है।

इसलिए अक्सर हमें लोगों की ऑनलाइन और वास्तविक पर्सनैलिटी अलग-अलग देखने को मिलती है। कभी–कभी लोग जो ऑनलाइन कान्फ्रेंट, बोल्ड और आउटसपोकन होते है, वह रियल लाइफ में बहुत शांत और इंट्रोवर्ट होते है । ऑनलाइन पर्सनालिटी और वास्तव फैसिलिटी में जमीन और आसमान का फर्क होता है, जब हम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर फिल्टर्ड लाइफ , परफेक्ट फोटोज और हर कोई खुश है और कमियाब है। रियल लाइफ में हर किसी की इनसिक्योरिटी, प्रॉब्लम्स और स्ट्रगल्स होते है ,जो हम ऑनलाइन नहीं देखने को नहीं मिलती ।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोगों को वैलिडेशन कि चाह होती है, लाइक्स, कमेंट्स, और फॉलोअर्स लोगो को इंस्टेंट खुशी देती है। इसके अलावा सोशल ट्रेंड्स और सोशल प्रेशर लोगो को प्रभावित करती है, जब हम कोई ऑनलाइन ट्रेंड्स , ब्यूटी स्टैंडर्ड्स और लाइफस्टाइल ऑनलाइन देखते है, हम खुद को उनसे नीचे देखते है और अपनी तुलना करते है, और अपना मनोबल गिरा देते हैं । इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हमारी वास्तव पर्सनैलिटी और ऑनलाइन पर्सनालिटी पूरी तरह फेक होती है। बस दोनों जगह उम्मीद, आजादी और दवाब अलग हैं। जरूरी है कि हम दोनों के बीच बैलेंस बनाए रखें और हमेशा खुद से ईमानदार रहे।