भगवान परशुराम: जन्म, कथाएं, शिष्य और उनसे मिलने वाली सीख

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भगवान परशुराम: जन्म, कथाएं, शिष्य और उनसे मिलने वाली सीख

भगवान परशुराम जी का जन्म वेशाक शुक्ल तिथि के रामायण काल मैं हुआ था जिसे हम त्रेता युग कहते है उन्होंने ऋषि जमदग्नि और रेणुका के घर जन्म लिया था और उन्हें भगवान नारायण का छठा अवतार भी कहा जाता है। उनका जन्म अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना के लिए हुआ था।

वैसे तो ग्रंथों में उनके कई नामों का उल्लेख है जैसे की जामदग्न्य, भार्गव, क्षत्रियंतक,  परशुधारी, रामभद्र, रेणुकेय और हर नाम के पीछे एक कथा है। विष्णुपुराण और महाभारत के अनुसार उनका नाम राम भी बताया गया है, किंतु जब कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक शस्त्र प्रदान किया तब से उन्हें परशुराम नाम से ही पूरे ब्रह्मांड में जाना गया है, वे केवल एक महान योद्धा ही नहीं बल्कि एक अत्यंत ज्ञानी और विद्वान गुरु भी थे उन्होंने अपने कठोर तप और ज्ञान से अनेक योद्धाओं को शिक्षा प्रदान कर उन्हें पराक्रमी और महान योद्धा बनाया। उनके शिष्य भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, और दानवीर कर्ण थे जो कि महाभारत काल के महावीर योद्धाओं में शामिल थे।

जब उन्होंने कठोर तपस्या कर देवताओं को प्रसन्न किया और अनंत काल तक भूलोक मैं अमर रहने का वरदान प्राप्त किया तभी से उनकी गिनती सात चिरंजीवों मैं होने लगी। जिसमें अश्वथामा, महाबली, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य,  और ऋषि वेदव्यास भी शामिल थे। पुराणों की माने तो ये चिरंजीवी आज भी पृथ्वी पर जीवित है और धर्म की रक्षा कर रहे है।

परशुराम जयंती की प्रचलित कथा

उनकी कुछ प्रसिद्ध कथाओं में से एक कथा यह भी है की जब भगवान श्रीराम माता सीता से स्वयंवर रचाने के लिए गए थे और उन्होंने शिव धनुष को तोड़ा था तब इस बारे में परशुराम जी को पता चला तो उन्होंने इसे भगवान शिव का अपमान माना और क्रोधित हो कर मन की गति से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम भगवान को चुनौती दी। उन्होंने श्रीराम से कहा कि अगर तुम सच्चे वीर हो तो उनके दिए धनुष पर प्रत्यांच चढ़ाकर कर दिखाओ। आगे की कथा के अनुसार श्री राम ने चुनौती को शांति से स्वीकारा और उनके दिए धनुष पर प्रत्यांच चढ़ा दीया तब परशुराम जी को समझ आया की भगवान श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि नारायण के ही अवतार हैं। इसके बाद परशुराम का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने श्रीराम को आशीर्वाद दिया।

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पुराणों में एक प्रचलित कथा यह भी है उनके पिता एक महान ऋषि थे और उनकी माता को पतिव्रता स्त्री कहा जाता था। रेणुका रोज नदी से जल लाकर अपने पति के यज्ञों में सहयोग देती थी एक दिन जब रेणुका जल लेने नदी की ओर गई तो उन्होंने वहां गंधर्वों को क्रीड़ा करते देखा और उनका मन कुछ देर के लिए  विचलित हो गया और उन्हें आश्रम आने में देरी हो गयी और इसका आभास उनके पिता जामदग्नि  को अपनी शक्ति से हो गया और उन्होंने अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वह अपनी माता का वध कर दे लेकिन उनके बड़े पुत्र ने आज्ञा मानने से इनकार कर दिया, किंतु परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता का वध कर दिया था। उनकी आज्ञाकारीता देख कर उनके पिता ने उन्हें वरदान मांगने को कहा तो परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने का वरदान माँगा और उनकी माता फिर से जीवित भी हो गई कथा के अनुसार इसके बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया था।

परशुराम जयंती का महत्व

कथाओं के अनुसार परशुराम जी का स्वभाव क्रोधी लेकिन न्यायप्रिय था वैसे तो वो एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे लेकिन फिर भी न्याय और धर्म की स्थापना के लिए उन्होंने शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र भी उठा लिए। परशुराम जयंती उनके जन्मदिवस के रूप मैं मनाई जाती है और इस दिन हम उनके साहस, पराक्रम, समर्पण और रक्षा के संकल्प को याद करते है, परशुराम जयंती पर हम उनकी पूजा अर्चना कर उन्हें याद करते है कहा जाता है की भगवान परशुराम आज भी हमारे बीच इस भूलोक में उपस्थित है। भगवान परशुराम जी से हमें यह सीख मिलती है की हमें हमेशा अधर्म के खिलाफ लड़ना चाहिए और जहां भी ग़लत होता दिखे उधर अपनी आवाज उठानी चाहिए एवं ज्ञान तथा शक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। उनका जीवन साहस, अनुशासन और न्याय की प्रेरणा देता है।

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