जब हम आत्मा को परमात्मा में विलीन कर देते हैं तो अंदर से साइंस निकलने लगता है।, डा. अरविंद शुक्ला

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जब हम आत्मा को परमात्मा में विलीन कर देते हैं तो अंदर से साइंस निकलने लगता है।, डा. अरविंद शुक्ला

ग्वालियर। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विद्यालय के कुलगुरू डॉ. अरविंद शुक्ला ने कहा कि विज्ञान में जितनी भी खोजें हुईंए उसकी 80 प्रतिशत खोजें गैरवैज्ञानिकों ने कीं। विज्ञान का यह कतई अर्थ नहीं कि आप साइंस जानते हों, विज्ञान का सीधा अर्थ है आपका कांसेप्ट क्लीयर हो। आपके पास इनोवेशंस, आइडियाज होने चाहिए। और वो आइडियाज धरातल पर कैसे होंगे, उसके वो कार्य होते हैं लैब में फील्ड में उसको हम टैक्निकल वर्क कहते हैं। डॉ. शुक्ला ने कहा कि विज्ञान की उत्पत्ति हमेशा दिमाग से होती है। डॉ . शुक्ला को विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत विज्ञानियो मे शामिल होने पर गुरूवार को पडाव स्थित आईकॉम सेंटर पर आयोजित सम्मान कार्यक्रम को संबोधित करते  हुए कही। उन्होंने मनुष्य के ज्ञान व अनुभवों से निकलने वाली रहस्यमयी चीजों पर विस्तार से प्रकाश डाला। कहा कि ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वह सब मनुष्य के अंदर आत्मा से निकला हुआ है। आप हमारे वेद, पुराण और उपनिषद पढिये तो आपको पता चलेगा कि कितने ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने सौ साल पहले सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति का वर्णन कर दिया। क्या इस छोटे से जीवनकाल में इन विशाल ग्रहों की गति को जान पाना संभव था। तो फिर ये सब कहां से आया यह सब हमारे दिमाग से आया, अंदर की आत्मा से निकलकर आया। डॉ शुक्ला ने कहा कि जब भी हम आत्मा को परमात्मा में विलीन कर देते हैं तो अंदर से साइंस निकलने लगता है। बाकी चीजों से दूर हटने लगते हैं। और तब वैज्ञानिकता को सिद्ध करने के लिए लैब और खेत की जरूरत पड़ती है।

आगे उन्होंने कहा कि मिट्टी में एक छोटा सा बीज विशाल वृक्ष का अस्तित्व लिए रहता है। बीज या अन्य किसी प्रयोग को लें, सारे के सारे कांसेप्ट दिमाग की उपज हैं, जो पहले दिमाग में फिर धरातल पर आते हैं।

मनुष्य का स्वास्थ्य मिट्टी के स्वास्थ्य पर निर्भर

डॉ शुक्ला ने अपने कटु अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि जब उन्होंने मनुष्य के स्वास्थ्य की निर्भरता मिट्टी से जोडने की संकल्पना प्रस्तुत की तो एम्स जैसे संस्थान के वैज्ञानिकों ने बहुत हल्के में लिया। लेकिन बाद में वे हतप्रभ रह गए और साथ काम करने का आग्रह करने लगे। डॉ. शुक्ला ने बताया कि यह बेहद दिलचस्प और शोध का विषय था जिसे मध्य प्रदेश के झाबुआ, मंडला, फिर गुजरात, तमिलनाडु और बिहार में प्रयोग किए गए। और तब यह शोध निकलकर सामने आया कि मनुष्य व पशुओं का स्वास्थ्य मिट्टी पर निर्भर है। यह सब दिमाग की उपज थी जो बाद में शोध के रूप में धरातल पर आई। 

इससे पूर्व कार्यक्रम के संयोजक डॉ. केशव पाण्डेय ने कार्यक्रम की रूपरेख प्रस्तुत की। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अरविंद शुक्ला के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ पाण्डेय ने कहा कि समाज ने हमें बहुत कुछ दिया है और अब देने की बारी है। हम जैसा कर्म रूपी बीज मिट्टी में डालते हैं वैसा ही वृक्ष रूपी फल हमें प्राप्त होता है। हम से बहुत लोग सवाल करते हैं कि हमें कुछ पाने की लालसा नहीं है फिर क्यों लगातार दौड़धूप कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यह सब करने से हमें आनंद की अनुभूति होती है। ऐसी अनुभूति जो बाजार में नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि डॉ. शुक्ला कर्म को अपना बीज मंत्र मानते हैं। उनकी कर्म करने की अनवरत साधना ने ही उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जो नोबेल से कम नहीं हैं। निश्चित रूप से वे बहुत बड़े सम्मान के अधिकारी हैं। उनके पद और बड़प्पन के लिए मैं निशब्द हूं कि वे एक निवेदन पर हमारे बीच हैं। इस अवसर पर नगर के गणमान्य जन उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन महेश मुदगल ने किया जबकि कार्यक्रम के अंत में उपस्थित गणमान्य लोगो का आभार पूर्व कार्यपरिषद् सदस्य प्रदीप शर्मा ने व्यक्त किया। इस अवसर पर वरिष्ट साहित्यकार महेश कटारे, एमडी पाराशर, पूर्व रजिस्ट्रार राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय अनिल सक्सेना, एसके शर्मा, पीडी पाण्डेय, आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री, एविंजल चाको, व अन्य लोग मौजूद रहे।

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