भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे कई व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने कार्यों, दूरदृष्टि और जनसेवा की भावना से लोगों के हृदय में अमिट छाप छोड़ी है। उन महान नेताओं में से एक नाम है ’’माधवराव सिंधिया’’। वे ग्वालियर राजघराने से ताल्लुक रखते थे उन्होंने राजतंत्र और लोकतंत्र दोनों को जिया। लेकिन उनकी पहचान केवल एक राजकुमार के रूप में सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में जिस समर्पण और ईमानदारी से देश और समाज की सेवा की, उसी ने उन्हें जनता के बीच एक लोकप्रिय नेता और जननायक बना दिया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
तत्कालीन ग्वालियर स्टेट के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया और राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पुत्र माधवराव सिंधिया का जन्म 10 मार्च 1945 को तत्कालीन बाम्बे प्रेसिडेंसी व वर्तमान के मुंबई में हुआ था। ग्वालियर के शाही परिवार से होने के कारण बचपन से ही उनमें शालीनता, नेतृत्व और समाजसेवा के संस्कार गहरे थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शिक्षा सिधिया परिवार द्वारा स्थापित ‘सिंधिया स्कूल‘ से प्राप्त की और आगे की पढ़ाई इंग्लैंड के प्रतिष्ठित ’’विनचेस्टर कॉलेज’’ और फिर ’’कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’’ से की।
राजनीतिक में सफर
माधवराव सिंधिया ने बहुत कम उम्र में राजनीति में कदम रखा। उन्होंने 1971 जनसंघ के टिकट पर ग्वालियर से कांग्रेस के केडी जाधव के खिलाफ पहला चुनाव मात्र 26 वर्ष की उम्र में लडा और एक लाख 41 हजार वोटो से अधिक वोटो जीतकर लोकसभा सदन पहुंचे। यह उनकी लोकप्रियता और जनता से गहरे जुड़ाव का प्रमाण था कि वे लगातार नौ बार लोकसभा सांसद रहे। शुरुआत में वे जनसंघ से जुड़े, लेकिन आपातकाल के बाद देश की राजनीति के बदलते स्वरूप के साथ बाद में कांग्रेस पार्टी में आ गए। 1980 कांग्रेस पार्टी के टिकट पर उन्होंने जनसंघ के प्रत्याषी नरेश जौहरी को एक लाख से अधिक वोटो से हराया। 1984 के आम चुनाव में बीजेपी के दिग्गज नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को ग्वालियर सीट से हराया। 1984 में अटल बिहारी वाजपेयी को हराने वाले तत्कालीन मंत्री माधवराव सिंधिया 1996 के लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में थे। तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार में हवाला कांड सामने आ गया। हवाला का पैसा ट्रांसफर करने वाले एक आरोपी को पुलिस ने पकड़ा। उसके पास से मिली लिस्ट में लाल कृष्ण आडवाणी, कमलनाथ और माधवराव सिंधिया सहित कई नेताओं के नाम संदिग्ध थे। कांग्रेस किसी तरह का विवाद नहीं चाहती थी और इससे बचने के लिए उसने अपने ही नेताओं से इस्तीफा मांग लिया। साथ ही यह शर्त रखी गई कि जिन नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दिया है, वे अपने किसी परिजन को अपनी जगह चुनाव लड़वाएं। कमलनाथ ने ऐसा किया और अपनी पत्नी को अपनी जगह कांग्रेस से लोकसभा चुनाव लड़वाया। लेकिन माधवराव सिंधिया इस बात के लिए तैयार नहीं थे तब उन्होंने मध्य प्रदेश विकास कॉंग्रेस पार्टी बनायी, यह एक तरह का निर्दलीय चुनाव था। अपने जन विकास की सोच और जनता में लोकप्रियता के बल पर उन्होंने कॉंग्रेस के शशि भूषण वाजपेयी को करारी हार दी। पर बाद में 1998 में अपनी पार्टी को कॉंग्रेस में ही विलय करा लिया।
बाद में सिंधिया ने ग्वालियर और 1998 में गुना से अंतिम चुनाव लडा और दोनो बार जीते।
माधवराव सिंधिया ने राजीव गांधी, व पीवी नरसिम्हाराव की सरकार में रेल, नागरिक उडडयन, पर्यटन, मानवसंसाधन विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। जिसमें 22 अक्टूबर 1986 से 1 दिसंबर 1989 तक रेलमंत्री का कार्यकाल विशेष रूप से याद किया जाता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में भारतीय रेल के आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्होंने रेल सेवाओं में समयबद्धता, सफाई और यात्रियों की सुविधाओं को प्राथमिकता दी। उन्होंने रेलगाड़ियों में कम्प्यूटरीकृत आरक्षण प्रणाली शुरू की, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों को नई रेल लाइनों से जोड़ा और रेल नेटवर्क को मजबूत किया। भारत में पर्यटन व व्यापारीयों को समय की बचत के लिए भारत में शताब्दी एक्सप्रेस शुरूआत की। जिसके लिए उन्होंने पेरिस की टीजीवी एक्सप्रेस की यात्रा की (जो उस समय की सबसे तेज ट्रेन मानी जाती थी।) और जापान की मदद से नई दिल्ली से झांसी के बीच शताब्दी की शुरूआत की। जिसे बाद में भोपाल तक बढाया गया। उनका उद्देश्य यात्रीयो को वातानुकुलित आरामदायक चेयरकार का सफर के साथ गरम व स्वादिष्ट खाना देना था। रेल मंत्री के रूप में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।
नागरिक उडडयन मंत्री रहते हुए उन्होंने इंडियन एयरलाइंस के प्रति बिना किसी पक्षपात के उसे खुले बाजार में निजी वाहकों के साथ प्रतिस्पर्धा करने दिया। इंडियन एयरलांइस के कर्मचारियो के आंदोलन व अशांति के दौर का सामाना किया। कार्यबल को अनुशासित करने की रणनीति के तहत रूस से विमान किराये पर लिये। जिसमें से 1992 में एक विमान के दुर्घाटना ग्रस्त होने पर नागरिक उडड्यन मंत्री के तौर पर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। ’’नागरिक उड्डयन मंत्री’’ के रूप में उन्होंने हवाई सेवाओं के विस्तार और आधुनिकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाद में उन्हें 1995 में मानवसंसाधन विकास मंत्री के रूप में फिर से मंत्रीमंडल में शामिल कर लिया गया। ग्वालियर में स्थापित भारतीय सूचना प्रौद्योगिक प्रबंधन संस्थान सिंधिया के बतौर मंत्री रहते स्थापित हुआ। बाद में जिसका नाम बदलकर ABV IIITM कर दिया।
खेलो के प्रति रूचि।
माधवराव सिंधिया राजनीति के साथ खेलो में भी सक्रिय रहते थे। उन्हें क्रिकेट उनका पसंदीदा खेल था। क्रिकेट के प्रति उनका समर्पण इस बात से पता चलता है कि वे क्रिकेट प्रशासनिक बॉडी के सदस्य बने, 1967 में ग्वालियर डिविजन क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना हुई और 1976 में वे अध्यक्ष बने। इसके बाद वे 1982-83 में वे मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने व 19 वर्षो तक इस पद पर रहे। इसके बाद वे 1991 से 1993 तक भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के भी अध्यक्ष रहे
माधवराव सिंधिया ने खेल प्रशासक के तौर पर ग्वालियर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की क्रिकेट सुविधाएं उपलब्ध कराई व कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम को अत्यावश्यक सुविधाओं का विकास कर आधुनिक रूप दिया।
असामयिक निधन
30 सितम्बर 2001 का दिन भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा झटका लेकर आया। उस दिन 56 वर्षीय माधवराव सिंधिया एक निजी विमान में सवार होकर अपने निजि सचिव रूपिंदर सिंह, इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार संजीव सिन्हा, हिंदुस्तान टाइम्स की अंजू शर्मा, आजतक से गोपाल बिष्ट व रंजन झा के साथ दिल्ली से कानपुर कांग्रेस की एक रैली को संबोधित करने जा रहे थे, तभी मैनपुरी के बाहरी ईलाके में भैसरौली गांव के ऊपर विमान में आग लग गई, और विमान दुर्घटना ग्रस्त हो गया दुर्घटना में हुई उनकी मृत्यु की खबर सुनकर पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि इतना ऊर्जावान और युवा नेता अचानक चला गया।
विरासत और स्मृति
माधवराव सिंधिया का जीवन भारतीय राजनीति में आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शाही परिवार से आने के बावजूद नेता जनता का सेवक हो सकता है। उनका नाम आज भी विकास, ईमानदारी और दूरदृष्टि का प्रतीक माना जाता है। ग्वालियर और मध्यप्रदेश की जनता उन्हें बड़े आदर और स्नेह से याद करती है। उनके सम्मन में भारत सरकार ने 2005 में डाक टिकट भी जारी किया था। उनके कार्यों और आदर्शों को उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।
माधवराव सिंधिया केवल ग्वालियर राजघराने के उत्तराधिकारी ही नहीं थे, बल्कि सच्चे अर्थों में जनता के सेवक थे। वे आम लोगों से जुड़ने और उनकी समस्याओं को समझने में विश्वास रखते थे। ग्वालियर और मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में उनके चाहने वाले बड़ी संख्या में थे। उनकी सरल भाषा, सहज व्यक्तित्व और आधुनिक सोच ने युवाओं को भी आकर्षित किया।
माधवराव सिंधिया का विवाह माधवी राजे सिंधिया से हुआ था। उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया भी राजनीति में सक्रिय हैं और वर्तमान समय में केंद्रीय मंत्री हैं। माधवराव अपने परिवार के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे और उन्हें एक आदर्श पिता व पति माना जाता था।
माधवराव सिंधिया का जीवन गहरी प्रेरणा देता है। उन्होंने दिखाया कि सच्चा नेता वही है जो जनता की नब्ज को समझे, उनकी समस्याओं को हल करे और विकास की नई राहें दिखाए। रेल मंत्री के रूप में उनका काम, उनकी ईमानदार छवि और जनसेवा का समर्पण उन्हें एक ’’जनप्रिय नेता’’ के रूप में अमर कर गया।
डाॅ. केशव पाण्डेय
प्रधान संपादक
ग्वालियर चंबल सांध्य समाचार