सुधीर सक्सेना: संवेदनशीलता और जिजीविषा से भरा रचनात्मक जीवन

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सुधीर सक्सेना: संवेदनशीलता और जिजीविषा से भरा रचनात्मक जीवन

आत्मीयता से भरे कवि-पत्रकार

सुधीर सक्सेना केवल कवि या पत्रकार नहीं, बल्कि आत्मीयता से भरे एक संवेदनशील मनुष्य हैं। उनकी पहचान ऐसी शख्सियत की है जो अपने परिवेश और अपनों से गहरे जुड़े रहते हैं। यही संवेदनशीलता उन्हें एक बेहतर कवि और सशक्त पत्रकार बनाती है। ‘माया’ पत्रिका के दौर में उनकी रिपोर्टिंग पढ़कर पूरी पीढ़ी ने राजनीतिक पत्रकारिता के मायने समझे। मध्यप्रदेश जैसे अपेक्षाकृत शांत राजनीतिक परिदृश्य से भी उन्होंने ऐसी खबरें लिखीं कि पूरे राज्य का राजनीतिक तापमान झलक उठता था।

शब्दों से दृश्य रचने की क्षमता

सुधीर जी की खासियत है उनकी भाषा। उनकी रिपोर्टिंग और लेखन में शब्द केवल सूचना नहीं देते, बल्कि एक दृश्य रचते हैं। यही गुण उन्हें अन्य पत्रकारों से अलग बनाता है। उनकी यायावरी और निरंतर अध्ययन ने उनके लेखन को असाधारण गहराई दी है।

कविता और पत्रकारिता में समान ऊर्जा

वे केवल पत्रकार ही नहीं, एक गंभीर कवि भी हैं। उनके कविता संग्रह— समरकंद में बाबर, बहुत दिनों के बाद, काल को नहीं पता, रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी, किरच-किरच यकीन—उनकी रचनात्मकता का प्रमाण हैं। एक बार उन्होंने मजाकिया दर्द में कहा था, “पत्रकार मुझे पत्रकार नहीं मानते और साहित्यकार मुझे साहित्यकार नहीं मानते।” उस पर मैंने कहा था—“आप न पत्रकार हैं, न साहित्यकार, आप जीनियस हैं।”

उनकी कविताएं उम्मीद और प्रेम से भरी हुई हैं। उनमें जीवन की आद्रता है, जो पाठक को भीतर तक छू लेती है। समरकंद में बाबर पढ़ते हुए महसूस होता है कि माटी और उसकी महक किस तरह स्मृतियों में गहरे दर्ज रहती है।

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माटी और महक से जुड़ा जीवन

सुधीर जी का जीवन किसी एक शहर या राज्य से नहीं बंधा। वे लखनऊ में जन्मे, वहीं पले-बढ़े, पर रायपुर और बिलासपुर की मिट्टी में रच-बस गए। भोपाल और दिल्ली में रहते हुए भी उनका दिल छत्तीसगढ़ की ओर खिंचता है। उनके दोस्त पूरी दुनिया में फैले हैं, पर आत्मीयता की जड़ें उनके गृहप्रदेश की माटी से जुड़ी हैं।

वे यारों के यार हैं, लेकिन भीतर से खानाबदोश। परिवार के लिए उन्होंने घर बनाया, पर खुद फकीराना अंदाज में जिए। सुविधाओं से घिरे होने के बावजूद उनका दिल हमेशा यात्राओं, नई जगहों और नए अनुभवों की ओर भागता है।

निरंतर सक्रियता और जिजीविषा

आज भी वे पाक्षिक पत्रिका ‘दुनिया इन दिनों’ का संपादन-प्रकाशन करते हुए लगातार यात्रा और अध्ययन में लगे रहते हैं। उनकी यही सक्रियता उन्हें खास बनाती है। वे नए-नए दोस्त बनाने की यात्रा कभी नहीं रोकते। उनके भीतर कोलंबस की आत्मा है—हमेशा नए क्षितिज खोजने को तत्पर।

स्मृतियों का संसार और जीवन का दर्शन

उनसे मिलना हमेशा आत्मीयता से भरा होता है। वे प्रेरित करते हैं—“लिखो, लिखो और लिखो।” उनके पास बैठना मानो एक विशाल वृक्ष की छांव में बैठने जैसा है, जहां सुरक्षा, प्रेम और स्मृतियों का संसार मिलता है।

सुधीर सक्सेना ने अब तक एक लंबी और सार्थक पारी खेली है। उनका पहला दौर पीढ़ियों की स्मृति में है, और उम्मीद है कि आने वाले समय में भी वे अपने ‘जीनियस’ होने का यकीन कराते रहेंगे।

— प्रो. संजय द्विवेदी

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