आज विश्व मजदूर दिवस पर जाने मजदूरों की कठिन जीवनशैली

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Today on World Labour Day, know about the difficult lifestyle of labourers

शहर की चमकती इमारतें, चौंड़ी सड़कें और चमकते घर जिस मजबूत नींव पर बने हैं वह नींव मजदूरों की कड़ी मेहनत है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन मजदूरों को उनके संघर्ष का इनाम नहीं मिल पा रहा है। वे अक्सर आर्थिक अव्यवस्था का सामना करते हैं। उन्हें हर सुबह यही व्याकुलता बनी रहती है कि आज फिर कुछ काम की खोज करनी है, बच्चों को पालना है, घर चलना है।

आज हमारे पास इतने श्रेष्ठ कारख़ाने, इमारतें, विद्यालय, महाविद्यालय हैं जो कि केवल मजदूरों द्वारा ही मुमकिन हो पाया है। लेकिन देखा जाए तो वे हमारे रहने के लिए तो छत का निर्माण कर देते हैं, परंतु ख़ुद पीछे रह जाते हैं। मजदूरों की रोज़ की दिहाड़ी इतनी नहीं है कि वे अपना पेट पाल सकें, बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठा सकें और अपना घर चला सकें।

कोई ईंट-गिट्टी उठाने का काम करते है तो कोई सीमेंट की बोरी उठाने का और उसमें भी उन्हें पूरे दिन काम करना होता है चाहे कड़ी धूप हो, बारिश हो, या ज़ोर की ठंड पद रही हो उन्हें अपनी रोज़ की दिहाड़ी के लिए करना होता है। इतनी कठिन मेहनत के बावजूद भी उनकी आय इतनी सीमित होती है कि उनके रोजमर्रा की ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पाती।

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उनकी ज़िन्दगी की बुनियाद—रोटी, कपड़ा और मकान —वे यह भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। कहीं अगर शहर से दूर रहना काम आ जाये तो उन्हें अपनी ख़ुद की बनायी खोपड़ी में रहना पड़ता है जिसमें गर्मी के समय ना तो कूलर-पंखे की व्यवस्था होती है और ना ही सर्दी में रज़ाई की। मज़दूरों की ज़िंदगी सामाजिक कठिनाइयों से भरी होती है। अक्सर उनके बच्चों की शिक्षा अधूरी रह जाती है, जिससे यह गरीबी का दलदल उनकी अगली पीढ़ी पर भी गहरा प्रभाव डालता है।

महंगाई ने उनकी मुश्किलों को और  बढ़ा दिया है, जिससे उनकी रोजमर्रा की ज़िंदगी में कड़ा असर पड़ता है। शिक्षा, स्वास्थ और यात्रा के क्षेत्र में वे पिछड़ जाते हैं। उनकी ज़िंदगी आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों से भरी है। स्वस्थ की बात करें तो उनकी रोज़ की आय इतनी नहीं होती कि वे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा सकें और सरकारी में आसानी से सुनवाई नहीं होती।

वहीं यात्रा के क्षेत्र में देखा जाए तो ऑटो-टैंपो के खर्चे इतने बढ़ गए हैं कि वे पैदल काम पर आते-जाते हैं ताकि उनकी रोज़ की दिहाड़ी में से कुछ बचा पाएं।

आखिर में सवाल यह उठता है कि क्या हम उनकी मेहनत को समझ रहे है जो हमारी ज़िंदगी में इतना बड़ा योगदान देते हैं? उन्हें केवल अच्छे रहन-सहन और उचित मूल की आवश्यकता है जो उनके रहन-सहन में अच्छा बदलाव ला सके।

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