अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: क्या प्रतिबंधित होती आजादी ?

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: क्या प्रतिबंधित होती आजादी ?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां लोगो को उनकी बात रखने, बोलने और लिखने की पूरी आजादी है। लेकिन हाल मैं ही इस मुद्दे पर काफी अलग-अलग विचारधारा सामने आई है, जो हमें सोचने पर मजबूर करती है की क्या सच में हमें हमारी बात बिना किसी डर के आज़ादी से बोलने का और अपने विचारो को खुल के व्यक्त करने का हक है। या फिर हमारे इस अधिकार को सीमित किया जा रहा है। कुछ मामलों मैं देखा गया है की जब व्यक्ति अपनी बात खुल के सोशल मीडिया पर प्रदर्शित करता है, तो उससे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अगर मुद्दा राजनैतिक, शासन या किसी प्रभावशाली हस्ती से जुड़ा हो तो उसे भारी ट्रोलिंग, अभद्र टिप्पणियों और विभिन्न आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। कई बार टिप्पणी करने वाले व्यक्ति पर कार्रवाई होने तक के हालात बन जाते हैं।

हालांकि कुछ विद्वान और जानकारों का इस पर कहना है की देश और नागरिकों  के निजी जीवन को सुरक्षित रखने के लिए यह सीमाएं बनाए रखना आवश्यक है। लेकिन वही कुछ लोग मानते हैं कि इससे हमारे विचारों को सीमित किया जा रहा है और यह लोकतंत्र का खंडन है। इन्हीं कार्यवाही एवं सरकारी मामलों से बचने के कारण लोग अब ऐसे मामलों से दूर रहने की कोशिश करते है और अपनी बात सीमित कर देते है। कई बार तो देखने मिलता है की पत्रकारों और मीडिया हाउस का झुकाव किसी एक पक्ष की ओर डोलता है और वह भी अपने बात खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। हालांकि कुछ बुद्धिजीवी और जानकारों का इस पर कहना है की देश और नागरिकों के निजी जीवन को सुरक्षित रखने के लिए यह सीमाएं बनाए रखना आवश्यक है। मगर सरकार का इस पर कहना है की लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी का गलत इस्तेमाल ना कर पाए और ऐसा कंटेंट जो लोगो मैं फूट डाले, ईर्षा और हिंसा जैसी भावनाएँ फैलाएं उसे समय पर रोकना भी जरूरी है। इससे वे फेक न्यूज़ ,ट्रोलिंग और भड़काने वाले मुद्दों से सुरक्षा बनाए रखने की कोशिश करते है, इसलिए कई बार फ्रीडम ऑफ़ स्पीच को नियंत्रित कर दिया जाता है।

इसीलिए आज के दौर मैं यह मुद्दा बहुत अहम हो गया है, क्या सच मैं यह सुरक्षा बनाए रखने के लिए किया जा रहा है, या हमसे हमारे अधिकारों को छीन कर हमारी आवाज को दबाया जा रहा है ।

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