इंदौर। स्वच्छता के सिरमौर इंदौर महानगर के भागीरथ पुरा में दूषित पानी पीने से अब तक 12 लोग कालकवलित हो चुके हैं। 1100 से ज्यादा लोग अभी भी बीमार हैं जो 20 से ज्यादा अस्पतालों में भर्ती होकर उपचाराधीन हैं ।मृतकों में छह माह के बच्चे से लेकर 75 वर्ष के वृद्ध तक शामिल हैं। मामले को लेकर बुधवार को दो जनहित याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर हुईं। इसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट ने शासन को पीड़ितों को निशुल्क उपचार सुनिश्चित करने का आदेश दिया।साथ ही स्टेटस रिपोर्ट कल दो जनवरी तक पेश करने को कहा है।
दूषित जल आपूर्ति से संक्रमित लोगों की सूचना मिलते ही मुख्यमंत्री मोहन यादव बुधवार की शाम को इंदौर पहुंचे। उन्होंने विभिन्न अस्पतालों में भर्ती पीड़ितों और उनके स्वजनों से मुलाकात की। उन्होंने कहा इस घटना से पीड़ित लोगों का शीघ्र स्वस्थ होना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
घटना में लापरवाही पाए जाने पर जोन के जोनल अधिकारी सहायक यंत्री एवं प्रभारी सहायक यंत्री लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। प्रभारी उपयंत्री लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। मामले की गहन जांच केलि वरिष्ठ अधिकारियों की समिति भी गठित कर दी गई है। जांच का जिम्मा आ ई पी एस नवजीवन पवार को दिया गया है।
दूषित जल आपूर्ति के लिए लापरवाह कार्मिकों के खिलाफ कार्रवाई, मामले की जांच वगैरह अपनी जगह ठीक है। एक बड़े कांड के बाद इस तरह के कर्मकांड की औपचारिकता निर्वाह करना राज्य सरकार के लिए जरूरी हो जाता है। यह सब होना ही चाहिए ताकि वास्तविक जिम्मेदारों का पता लगाकर कार्रवाई को अंजाम दिया जा सके। सरकार इतना ही कर सकती है। वह हर शहर में घर-घर जाकर पानी के दूषित होने और न होने का परीक्षण नहीं कर सकती। इसके लिए नगर निगम की निगरानी में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग होता है। पहले यह विभाग स्वतंत्र रूप से कार्य करता था लेकिन अब यह नगर निगम के अधीन काम करता है। किसी भी आकस्मिक और भयावह स्थिति के लिए हर जगह सक्षम और सजग कार्मिकों की तैनाती सुनिश्चित की जाती है। मामूली लापरवाही भी जनहानि का कारण नहीं बन जाए उन्हें इसी बात के लिए मोटी तनख्वाह और तमाम तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। उन्हें किसी भी आपदा से निपटने के लिए अत्याधुनिक उपकरणों से लैस रखा जाता है। उसके बाद भी लंबे समय से दूषित जल आपूर्ति होते रहना संकेत देता है कि संबंधित अमले ने उस ओर तत्काल ध्यान नहीं देकर लापरवाही बरती। यही कारण है कि घटना को लेकर तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं जिनके जवाब नगर निगम अमले के पास नहीं हैं।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब एक बस्ती में दूषित जल आपूर्ति की जा रही थी, उस दौरान लोगों ने उसकी शिकायत संबंधित अमले से जरूर की होगी। शिकायत मिलने ही दूषित जल आपूर्ति का नोटिस ले लिया जाता तो इतनी बड़ी जनहानि नहीं होती।
एक अन्य सवाल यह भी है कि इंदौर हर साल मध्यप्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में स्वच्छता सर्वेक्षण में अव्वल आता है ऐसे में इस तरह का दूषित जल कांड होना की उसकी छबि को धूमिल करने के लिए पर्याप्त है। आशा है इंदौर निगम प्रशासन इस दुखांतिका से सबक लेगा, जिससे भविष्य में ऐसी जनहानि न हो।