Batwara 1947’: आजादी के जश्न के बीच पर्दे पर लौटा बंटवारे का दर्द

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टी.एन.मनीष

15 अगस्त के दिन देश आजादी का जश्न मना रहा है। जश्न ए आजादी के मौके पर रिलीज हुई ‘Batwara 1947’ ने आजादी के साथ जुड़े इतिहास के दूसरे और दर्दनाक पक्ष—विभाजन—को पर्दे पर सामने रखा है। सनी देओल और प्रीति जिंटा अभिनीत इस फिल्म का निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया है। कहानी 1947 के विभाजन की पृष्ठभूमि में रखी गई है। फिल्म में उस दौर के उन रिश्तों और परिस्थितियों को सामने लाने की कोशिश की गई है जिन पर विभाजन का गहरा असर पड़ा था।
फिल्म की रिलीज ऐसे दिन हुई है जब देशभर में स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। यही वजह है कि फिल्म की कहानी को लेकर चर्चा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। आजादी के साथ विभाजन की याद भी भारतीय इतिहास का हिस्सा है और उस दौर की कहानियां आज भी लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं। सबसे पहले आपको संक्षेप में बताते हैं कि आखिर यह कहानी आई कहां से किस नाटक पर आधारित है और कैसे यह एक फिल्म का रूप ले पाई

दरअसल राजकुमार संतोषी की ” फिल्म बंटवारा 1947 ” असगर वजाहत के प्रसिद्ध नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई’ पर आधारित है , 1947 के भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म को राजकुमार संतोषी ने निर्देशित किया है। फिल्म की कहानी समाज में आपसी नफरत और मजहबी तौर पर खींची गई सरहदों की खाई के बीच मानवता दया और आपसी भाईचारे की असली शक्ति को पूरी तरह से प्रदर्शित करने की कोशिश है।

फिल्म की कहानी और मुख्य संदेश :

विस्थापन और परिवार: भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान लखनऊ का निवासी एक मुस्लिम शरणार्थी परिवार यानी सिकंदर मिर्जा और उनकी पत्नी हामिदा भारत से पाकिस्तान के लाहौर में आकर बसने को किस तरह मजबूर हुए यह इस फिल्मी कहानी में दिखाया गया है।

बुजुर्ग हिंदू महिला और हवेली : खास बात यह है कि लाहौर में जिस हवेली या घर में यह परिवार रहने आता है, वहाँ एक बुजुर्ग हिंदू महिला (‘माई’) पहले से रह रही होती है जो किसी वजह से भारत नहीं जा सकी।
इंसानियत का नाता : फिल्म की की शुरुआत में धार्मिक तनाव और उथल-पुथल मचती है, लेकिन कहानी के आगे बढ़ने के साथ ही धीरे-धीरे सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) और उस बुजुर्ग महिला के बीच एक गहरा और भावनात्मक रिश्ता बन जाता है।

कट्टरपंथियों से टकराव: कहानी में मोड तब आता है जब स्थानीय कट्टरपंथी और चरमपंथी उस बूढ़ी हिंदू महिला माई को को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं, और सिकंदर मिर्जा का पूरा परिवार अपनी जान की परवाह न करते हुए इंसानियत की मिसाल बनकर समाज के विरुद्ध जाते हुए बुजुर्ग हिंदू महिला की रक्षा का निर्णय लेता हैं और समाज के खिलाफ जाकर उसकी रक्षा करने का फैसला करता है।

अब बात की जाए फिल्म के प्रारंभिक रिएक्शंस पर तो सनी देओल के बेहतरीन अभिनय की चर्चा खास तौर पर हो रही है। बड़ी बात यह है कि बंटवारा 1947 फिल्म को लेकर आम दर्शकों की राय फ़िल्म समीक्षकों की राय से मेल नहीं खा रही। हम कह सकते हैं की फिल्म देखने के प्रति दर्शकों का उत्साह तो बना हुआ है लेकिन जैसा हर फिल्म के साथ होता है वैसा ही इस फिल्म के साथ भी हो रहा है क्योंकि इसमें भी फिल्म को अपनी गहरी नजर से देखने वाले आलोचना भरी प्रतिक्रिया भी देने से पीछे नहीं रहना चाहते। बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस फिल्म को वैसी बड़ी शुरुआत नहीं मिली जैसी उम्मीद की जा रही थी प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार अपने प्रदर्शन के पहले दिन भारत में फिल्म ने तकरीबन 5.75 करोड रुपए कमाए। दरअसल बटवारा 1947 फिल्म के साथ ही रिलीज हुई ‘Awarapan 2’ ने भी इसे बॉक्स ऑफिस पर कड़ी टक्कर दी।

हालांकि दोनों का ही मुकाबले लगातार जारी रहेगा ऐसा कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि यह तो आरंभिक तौर पर आए हुए आंकड़े हैं जिसमें बदलाव पूरी तरह संभव है हो सकता है आने वाले दिनों में दर्शकों का प्यार विभाजन की दर्द भरी इस कहानी को मिलता रहे लेकिन अभी यह कहना संभव नहीं है की कहानी दर्शकों की पसंद के पैमाने पर सफल हुई या असफल। मौजूदा समय में देश के दर्शक बुद्धिजीवी और आम लोगों के बीच अक्सर चर्चा में रहने वाले विभाजन के पहलुओं पर प्रकाश डालती इस फिल्म को सेल्युलाइड के परदे पर कितने लंबे समय तक प्रदर्शन की अनुमति दर्शकों की तरफ से मिलती है यह तो रिएक्शंस और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन दोनों मिलकर ही तय करेंगे।

फिल्म से जुड़े तमाम तथ्यों को किनारे पर रखते हुए यदि बात ‘Batwara 1947’ की करें तो इसके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि सिनेमा का पर्दा हमारे इतिहास का कोई दस्तावेज नहीं हो सकता लेकिन हमारी मौजूदा पीढ़ी को अतीत की इस बड़ी घटना के बारे में रूपहले पर्दे पर इंसानियत से भरी कहानी और जज्बाती संवादों के जरिए रूबरू जरूर कराता है।

आजादी पर्व 15 अगस्त पर इस फिल्म की रिलीज क्या यह बड़ा सवाल नहीं खड़ा करती कि हम अपनी आजादी की कहानी को केवल समारोह की शक्ल में याद रखें या आजादी की लंबी लड़ाई के पीछे समाहित दर्द को शिद्दत से महसूस भी करें।

आज का विचार:

इतिहास को याद करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम उससे सीखें, केवल उसे दोहराएं नहीं।

सांध्य संदेश:

आजादी के उत्सव के साथ उन लोगों की कहानियों को भी याद करें जिन्होंने विभाजन का दर्द झेला।