ईद-उल-अज़हा,जिसे बकरीद भी कहा जाता है, इस्लाम का बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है। जिसका उद्देश्य दुनिया में, त्याग आस्था और विश्वास का संदेश फैलाना है।
इसको लेकर एक बहुत ही ख़ास और अनोखी कहानी है। बहुत समय पहले Prophet Ibrahim नाम के एक बहुत ही नेक और सच्चे दिल के इंसान थे। वे अल्लाह पर बेहद भरोसा रखते थे और हमेशा लोगों को अल्लाह की राह पर चलने की सीख देते थे। एक दिन उन्होंने सपना देखा कि सपने में अल्लाह उनसे उनकी कोई प्यारी चीज़ की कुर्बानी माँग रहे हैं, और prophet ibrahim के लिए सबसे कीमती और प्यारी चीज़ उनका बेटा था जिससे वो बेहद मोहब्बत करते थे।
एक पिता के लिए अपने बेटे से प्यारी कोई भी चीज़ नहीं होती। ये उनके लिए एक बहुत ही बड़ी परीक्षा थी। अपने बेटे की कुर्बानी देना आसान नहीं था, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रख के अल्लाह की बात मानने का फ़ैसला लिया। जब उन्होंने यह बात अपने बेटे को बताई तो उसमें भी बहुत हिम्मत दिखाई और अपने पिता की बात मानकर अपनी कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गया। उनके बेटे का नाम इस्माइल था उन्होंने कहा कि आप वही करें जो अल्लाह का संदेश है मैं सब्र रखूंगा और अल्लाह पर विश्वास रखूँगा।
इसके बाद prophet Ibrahim अपने बेटे Ismail की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए जैसे ही वो इस कठिन काम को अंजाम देने वाले थे अल्लाह ने उनकी परीक्षा को स्वीकार कर लिया और एक चमत्कार किया और बेटे की जगह एक बकरे को भेज दिया जिसकी कुर्बानी हो गई। इस घटना से अल्लाह ने यह दर्शाया की आस्था और विश्वास में कितनी शक्ति होती है, अगर हम उनकी राह पर चलेंगे और उनके फैसलों पर यकीन बनाए रखेंगे तो अल्लाह हमें किसी भी दुख या परेशानी का सामना नहीं करने देंगे और उन्होंने ये सब इसलिए किया जिससे वह संसार में त्याग और समर्पण की सीख लोगो को दे पाए।
इसीलिए आज भी अल्लाह की उस सीख को याद करते हुए यह ईद मनाई जाती है। इस दिन लोग नमाज पढ़ते है, अपनी किसी अजीज़ की कुर्बानी देते है क्योंकि जब किसी जानवर को पाल–पोस कर बड़ा करते है तो वह भी हमारे परिवार का हिस्सा बन जाता है इसीलिए आज के दिन उसकी कुर्बानी दी जाती हैं। उसके बाद उसके तीन हिस्से किए जाते हे जिसका एक हिस्सा परिवार में, एक हिस्सा रिश्तेदारों में और एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंद लोगों में बांट दिया जाता है। यह त्योहार आज इस्लाम में पूरे विश्वास के साथ मनाया जाता है।