भोपाल। मध्यप्रदेश के भोपाल, इंदौर, ग्वालियर समेत अन्य प्रमुख शहरों में लगातार बिगड़ती वायु व्यवस्था को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है।एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच भोपाल ने आदेश जारी किया है जिसमें इसे गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट करार दिया है। साथ ही राज्य सरकार को जवाबदेही तय करने और ठोस नीति लागू करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में एक उच्च स्तरीय संयुक्त समिति गठित कर 6 सप्ताह में रिपोर्ट तलब की गई है।
नाॅन अटेनमेंट सिटी
याचिकाकर्ता राशिद नूर खान के आवेदन पर आदेश देते हुए एनजीटी सेंट्रल बेंच में जस्टिस शेष कुमार ने इस मामले की सुनवाई की। एनजीटी ने अपने आदेश में कहा है भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा नाॅन अटेनमेंट सिटी घोषित किया गया है। इन शहरों में पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से पीएम-10और पीएम 2.5 के स्तर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों से लगातार ऊपर बने हुए हैं।
एनजीटी के अनुसार
एनजीटी के अनुसार भोपाल में पीएम-10 का अधिक औसत स्तर 130 से 190 माइकोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम 2.5 का स्तर 80 से 100 माइकोग्राम प्रति घन मीटर तक रिकॉर्ड किया गया है, जो निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई झीलों की नगरी कहलाने वाला भोपाल अब शीतकाल में घनी धुंध, कम दृश्यता और बहुत खराब से गंभीर श्रेणी के वायु गुणवत्ता सूचकांक(एक्यूआई) का सामना कर रहा है। कई रातों में यहां का एक्यूआई 300 के पार दर्ज किया गया।
एनजीटी ने स्पष्ट किया कि यह स्थिति किसी एक कारण से नहीं, बल्कि पराली जलाने, निर्माण और विध्वंस कार्यों से उड़ती धूल, वाहनों का उत्सर्जन, खुले में कचरा जलाना, लैंडफिल में आग, पटाखों का उपयोग और औद्योगिक गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव का नतीजा है।एनजीटी ने यह भी कहा कि दिल्ली-एनसीआर में लागू ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान और एयर शेड आधारित नीति की तर्ज पर मध्यप्रदेश में अब तक कोई प्रभावी राज्यस्तरीय तंत्र लागू नहीं किया गया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने एक संयुक्त समिति का गठन किया है, जिसमें पर्यावरण नगरीय विकास, परिवहन विभाग, एमपीपीसीबी, इंपीसीओ और सीपीसी के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी को शामिल किया गया है।