भारतीय सिनेमा के महान कॉमेडी कलाकार असरानी, जिनकी यादगार भूमिकाएँ दशकों तक दर्शकों को हँसाती रहीं, ने अपने जीवन के आखिरी वर्षों में एक ऐसी बात कही थी जिसने सबको चौंका दिया था। उन्होंने स्वीकार किया था कि सनी लियोनी स्टारर फिल्म ‘मस्तीजादे’ (2016) में काम करना उनका सबसे बड़ा अफसोस था।
उन्होंने कहा था कि उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि फिल्म इतनी अश्लील और बोल्ड कॉमेडी में तब्दील हो जाएगी। असरानी का मानना था कि हिंदी कॉमेडी सिनेमा अब उस राह पर चला गया है जहाँ ह्यूमर की जगह वल्गैरिटी (अश्लीलता) ने ले ली है — और यह भारतीय परिवारों की परंपरा से मेल नहीं खाता।
असरानी का बयान जिसने सोचने पर मजबूर किया
2016 में पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में असरानी ने कहा था, “महमूद साहब ने कभी-कभी डबल मीनिंग डायलॉग का इस्तेमाल किया, लेकिन उनमें भी मर्यादा थी। अब तो बस कपड़े उतारने की बात बाकी रह गई है। जो कुछ चल रहा है, वह टेरिबल और शर्मनाक है।”
उन्होंने आगे कहा — “मैंने मस्तीजादे में काम किया, लेकिन मुझे नहीं पता था कि फिल्म इस तरह बनाई जाएगी। अगर पता होता, तो मैं कभी इसका हिस्सा नहीं बनता।” असरानी की ये बातें उस दौर में आई थीं जब हिंदी सिनेमा में बोल्ड और एडल्ट कॉमेडी फिल्मों का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा था — ग्रैंड मस्ती, क्या कूल हैं हम, और मस्तीजादे जैसी फिल्मों के साथ।
फैमिली सिनेमा में विश्वास रखने वाले असरानी
असरानी हमेशा फैमिली एंटरटेनमेंट और साफ-सुथरी कॉमेडी के पक्षधर रहे। उन्होंने कहा था, “मल्टीप्लेक्स दर्शक अब समझने लगे हैं कि यह अश्लीलता लंबे समय तक नहीं चलेगी। हम भारतीय परिवार-केंद्रित लोग हैं, और अंततः लोग फिर उसी तरह की फिल्मों की ओर लौटेंगे जो पूरे परिवार के साथ देखी जा सके।” उनका मानना था कि कॉमेडी का असली उद्देश्य मनोरंजन के साथ संस्कृति और नैतिकता का संतुलन बनाए रखना है — और यह संतुलन नई पीढ़ी के निर्देशकों को सीखना चाहिए।
‘शोले’ का जेलर — असरानी की अमर भूमिका
असरानी का नाम लेते ही दर्शकों को याद आता है — “हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं!” यह मशहूर डायलॉग और किरदार फिल्म ‘शोले’ (1975) में असरानी ने निभाया था, जो आज भी पॉप कल्चर का हिस्सा है। इस साल की शुरुआत में BBC को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “शोले के 50 साल पूरे हो गए, लेकिन आज भी कोई ऐसा समारोह नहीं होता जहाँ मुझसे वो डायलॉग दोहराने को न कहा जाए। ये सिप्पी साहब के डायरेक्शन और सलीम-जावेद की लेखनी का कमाल है।”
उन्होंने आगे कहा, “मुझे एक किरदार को जीने और तैयार करने का मौका मिला — और वही मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक था। मैं रमेश सिप्पी और सलीम-जावेद साहब को सलाम करता हूँ। आज भी लोग उस जेलर को दिल से याद करते हैं।”
असरानी: कॉमेडी का वह नाम जिसने हर युग में हँसाया
असरानी का फिल्मी करियर पाँच दशकों से भी लंबा रहा। ‘शोले’, ‘चुपके चुपके’, ‘गोल माल’, ‘अभिमान’, ‘भूत बंगला’ से लेकर ‘राजा बाबू’ और ‘धमाल’ तक — उन्होंने हर युग में दर्शकों को हँसी और सीख दोनों दीं। उनकी कॉमिक टाइमिंग, संवाद अदायगी और मासूम चेहरे के साथ हास्य प्रस्तुत करने की कला ने उन्हें भारतीय सिनेमा का अमर कॉमेडियन बना दिया।
अंतिम वर्षों में मिला सम्मान
अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में असरानी थिएटर और नए कलाकारों के प्रशिक्षण से जुड़े रहे। उन्होंने कहा था कि वे चाहते हैं कि अगली पीढ़ी “कॉमेडी को हँसी के साथ इज़्जत भी दे”। उनके निधन के साथ ही हिंदी सिनेमा का एक ऐसा युग खत्म हो गया, जिसने हँसते-हँसते दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी।