स्मार्ट सिटी बनीं, लेकिन क्या शहर सचमुच स्मार्ट हुए? विकास की असली परीक्षा अभी बाकी

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स्मार्ट सिटी मिशन के तहत करोड़ों रुपये खर्च कर आधुनिक सुविधाएं विकसित की गईं, लेकिन जलभराव, ट्रैफिक, खराब सड़कें और कचरा प्रबंधन जैसी समस्याएं आज भी सवाल खड़े करती हैं। आखिर स्मार्ट सिटी की असली पहचान क्या होनी चाहिए?

टी.एन. मनीष

देश के कई शहरों को आधुनिक और बेहतर शहरी सुविधाओं से लैस करने के उद्देश्य से स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया गया। इसके तहत सड़कों का विकास, बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट, डिजिटल सेवाएं, निगरानी व्यवस्था, सार्वजनिक सुविधाओं और शहरी आधारभूत ढांचे को मजबूत करने जैसे कई कार्य किए गए।

कई शहरों में इन परियोजनाओं के सकारात्मक परिणाम भी दिखाई दिए हैं। लेकिन दूसरी तरफ आम नागरिकों के सामने एक अहम सवाल अब भी खड़ा है—क्या स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का वास्तविक लाभ शहर की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई दे रहा है?

क्योंकि किसी शहर को स्मार्ट बनाने का मतलब केवल नई सड़कें, आकर्षक चौराहे, डिजिटल स्क्रीन और आधुनिक इमारतें बनाना नहीं है। असली परीक्षा तब होती है जब शहर भारी बारिश, ट्रैफिक दबाव, जलभराव, बिजली या अन्य आपात परिस्थितियों का सामना करता है।

स्मार्ट सिटी के बावजूद क्यों बनी हुई हैं पुरानी समस्याएं?

कई शहरों में सड़कें बेहतर हुई हैं, ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार हुआ है और निगरानी व्यवस्था को तकनीक से मजबूत किया गया है। इसके बावजूद जलभराव, ट्रैफिक जाम, कचरा प्रबंधन, प्रदूषण, खराब सड़कें और अवैध निर्माण जैसी समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

इससे यह सवाल उठता है कि क्या केवल नई परियोजनाएं शुरू करना पर्याप्त है?

किसी भी शहरी परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसके रखरखाव, संचालन, गुणवत्ता और लंबे समय तक उपयोगी बने रहने पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है।

ग्वालियर में बारिश ने सामने रखी चुनौती

यदि ग्वालियर की बात करें तो स्मार्ट सिटी की अवधारणा की असली परीक्षा मानसून के दौरान दिखाई देती है। तेज बारिश के बाद शहर के कई हिस्सों में सड़कें खराब होने, गड्ढे उभरने और जलभराव जैसी समस्याओं की शिकायतें सामने आती रही हैं।

ऐसे में नागरिकों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब शहर में आधुनिक शहरी परियोजनाओं पर बड़ी राशि खर्च की जा रही है, तो तेज बारिश के दौरान सड़क, ड्रेनेज और यातायात व्यवस्था दबाव में क्यों आ जाती है?

यह सवाल केवल सड़क निर्माण की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। इसके साथ जलनिकासी व्यवस्था, निर्माण कार्यों की निगरानी, विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय और समय पर मरम्मत जैसे मुद्दे भी जुड़े हैं।

स्मार्ट सिटी की असली परीक्षा बारिश में

किसी शहर को स्मार्ट कहने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसकी बुनियादी व्यवस्था सामान्य और असामान्य दोनों परिस्थितियों में कितनी प्रभावी है।

यदि बारिश के बाद प्रमुख सड़कें जलमग्न हो जाएं, यातायात व्यवस्था प्रभावित हो, सड़कें टूटने लगें या लोगों को घंटों जाम में फंसना पड़े, तो सिर्फ आधुनिक परियोजनाओं की मौजूदगी शहर को स्मार्ट नहीं बना सकती।

स्मार्ट सिटी का मूल्यांकन उसके विज्ञापन या उद्घाटन समारोह से नहीं, बल्कि नागरिकों के अनुभव से होना चाहिए।

सिर्फ ग्वालियर नहीं, कई शहरों के सामने यही चुनौती

शहरी विकास की यह चुनौती केवल ग्वालियर तक सीमित नहीं है। देश के कई शहरों में भारी बारिश के बाद जलनिकासी, सड़क की गुणवत्ता और रखरखाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

इससे एक बात स्पष्ट होती है कि शहरी विकास में निर्माण के साथ गुणवत्ता और रखरखाव को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।

किसी परियोजना पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद यदि कुछ ही समय में उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठने लगें, तो यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं है। इससे नागरिकों का प्रशासन और विकास परियोजनाओं पर भरोसा भी प्रभावित होता है।

प्रशासन की जवाबदेही भी जरूरी

स्मार्ट सिटी को सफल बनाने में नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी उससे कम नहीं है।

निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की नियमित जांच, स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, समयबद्ध रखरखाव और ठेकेदारों की जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। परियोजनाओं की निगरानी केवल कागजों तक सीमित न रहकर जमीन पर भी दिखाई देनी चाहिए।

साथ ही अलग-अलग विभागों और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए, ताकि सड़क, सीवर, ड्रेनेज, बिजली और यातायात जैसी व्यवस्थाएं एक-दूसरे से जुड़ी योजनाओं के रूप में विकसित हों।

नागरिकों की भागीदारी के बिना स्मार्ट सिटी अधूरा

शहर को स्मार्ट बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, सड़कों पर कचरा फेंकना, नालियों में कचरा डालना या यातायात नियमों की अनदेखी करना शहर की व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

इसलिए स्मार्ट सिटी को केवल सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी का अभियान बनाना होगा।

स्मार्ट सिटी की नई परिभाषा तय करने का समय

आज स्मार्ट सिटी का मतलब केवल चौड़ी सड़कें, सुंदर चौराहे, डिजिटल बोर्ड और आधुनिक तकनीक नहीं होना चाहिए।

वास्तविक स्मार्ट सिटी वह है जहां—

  • बारिश के दौरान जलभराव कम से कम हो।
  • सड़कें गुणवत्तापूर्ण और टिकाऊ हों।
  • यातायात व्यवस्था सुचारु रहे।
  • कचरा प्रबंधन प्रभावी हो।
  • नागरिकों को सुरक्षित और सुविधाजनक आवागमन मिले।
  • शिकायतों का समय पर समाधान हो।
  • विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही हो।
  • पर्यावरण और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाएं।

आखिरकार स्मार्ट सिटी की पहचान उसके दिखावे से नहीं, बल्कि उसकी व्यवस्था की मजबूती से होती है।

ग्वालियर समेत देश के सभी शहरों के सामने अब चुनौती यह है कि स्मार्ट सिटी की परियोजनाओं को केवल निर्माण तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें लंबे समय तक प्रभावी और उपयोगी बनाया जाए।

शहर तब सचमुच स्मार्ट होगा, जब तकनीक के साथ व्यवस्था भी स्मार्ट होगी और विकास के साथ नागरिकों का भरोसा भी मजबूत होगा।

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