आज विश्व अस्थमा दिवस पर जानिये अस्थमा के लक्षण, बचाव और सही इलाज

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आज विश्व अस्थमा दिवस पर जानिये अस्थमा के लक्षण, बचाव और सही इलाज

अस्थमा एक पुरानी सांस संबंधी गंभीर बीमारी है जिसमें सांस लेने की नली में सूजन हो जाती है और नली संकरी हो जाती है। अस्थमा से सांस लेने में दिक्कत होती है, सीटी जैसी, खांसी और सीने में खिंचावट होती है। अस्थमा शब्द यूनानी भाषा के एक शब्द “AAZEIN” से आया है, जिसका मतलब “हाँफना” या “तेज़ साँस लेना” होता है। अस्थमा के इतिहास का उल्लेख सबसे पहले तकरीबन 1550 ईसा पूर्व EGYPTIAN के एक चिकित्सा ग्रंथों में मिला था। बताया गया है कि उस समय के लोग देसी इलाज अपनाते थे, जैसे कि जड़ी-बूटियाँ या धुएं से इलाज करने की कोशिश करते थे। लगभग 400 ईसा पूर्व, यूनान के जाने-माने चिकित्सक Hippocrates ने अस्थमा को एक गम्भीर श्वसन बीमारी के रूप में पहली बार पहचाना। उन्हें “father of medicine” यानी चिकित्सा विज्ञान का जनक भी कहा जाता है।

उस समय के लोग बीमारियों को देवता आना या अंधविश्वास मानते थे लेकिन हिपोक्रेट्स ने बीमारियों को वैज्ञानिक तौर से समझने की कोशिश की और फिर उन्होंने देखा कि लोगों को धूल, ठंडी हवा, बदलते मौसम और अधिक मेहनत करने से या धुएँ के संपर्क में आने से सांस लेने में कठिनाई होती है। इसके बाद उन्होंने यह भी गौर किया कि यह परेशानी मजदूरों, लोहारों और धूल के वातावरण में रहने वाले लोगों में ज़्यादा दिखायी दे रही है। इन सब चीज़ों के बाद उन्होंने अस्थमा को पर्यावरण और जीवनशैली से जुड़ी बीमारी माना। हालांकि उस समय कई प्रकार की मशीनें नहीं हुआ करती थी लेकिन फिर भी हिपोक्रेट्स ने आगे चलकर अस्थमा की जांच की।

भारत में प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में भी सांस के संबंधी बीमारियों का वर्णन मिला है। आयुर्वेद में अस्थमा को “श्वास रोग” कहा गया है। आयुर्वेदाचार्य चरक और सुश्रुत ने खांसी, सीने में जकड़न और सांस लेने में तकलीफ़ जैसी समस्याओं का उल्लेख किया।

आयुर्वेद में योग, ध्यान, प्राकृतिक उपचार और जड़ी-बूटियों के माध्यम से सांस संबंधी बीमारियों का इलाज किया जाता था। साथ ही ठंडी हवा, धूल, धुएं से बचने की सलाह दी जाती थी। 17 वी और 18 वी सदी में डॉक्टरों ने अस्थमा पर रिसर्च की और पता लगाया कि अस्थमा एक एसी बीमारी है जिसमें फेफड़ों के सांस लेने वाली नलियाँ सिकुड़ जाती हैं और सूज जाती हैं। धीरे-धीरे मेडिकल साइंस आगे बढ़ी और 20वीं सदी में अस्थमा के इलाज के लिए इनहेलर और नई दवाइयाँ बनाई गईं। इनहेलर और दवाइयों से मरीज़ों को राहत मिलने लगी और बीमारी को नियंत्रण में लेना आसान हो गया। आज सही देखभाल और आधुनिक इलाज की मदद से अस्थमा के मरीज़ सामान्य जीवन जीने लगे।

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अस्थमा को सबसे पहले कहाँ खोजा गया?

अस्थमा कोई वायरस या बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी नहीं है इसीलिए इसे पहली बार किसी एक देश में नहीं देखा गया। लेकिन इसका उल्लेख सबसे पहले इजिप्ट में मिला फिर ग्रीस में इसे चिकित्सा रूप में समझा गया।

अस्थमा के मुख्य कारण: धूल और प्रदूषण, धुआं, एलर्जी, मौसम में बदलाव, पालतू जानवरों के बाल, धूम्रपान, आनुवंशिक कारण।

अस्थमा के लक्षण: सांस फूलना, सीने में जकड़न, लगातार खांसी, सांस लेते समय सीटी की आवाज़ आना।

अस्थमा के इलाज: अस्थमा पूरी तरह सही नहीं हो सकता लेकिन सही इलाज लेने से उसे नियंत्रण में लिया जा सकता है: इनहेलर, दवाइयां, एलर्जी से बचाव, नियमित व्यायाम, साफ़ वातावरण।

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