14 जनवरी को देशभर में 265वां पानीपत शौर्य दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल इतिहास की एक तारीख नहीं, बल्कि मराठा शौर्य, बलिदान और राष्ट्ररक्षा के संकल्प का प्रतीक है। पानीपत की तीसरी लड़ाई भारतीय इतिहास में से एक रही, जिसमें मराठा साम्राज्य को भारी क्षति उठानी पड़ी, लेकिन इसी संघर्ष से ऐसे योद्धा उभरे जिन्होंने भारत के राजनीतिक और सैन्य भविष्य को नई दिशा दी। इस ऐतिहासिक संदर्भ में सिंधिया राजवंश का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सिंधिया योद्धाओं की बहादुरी के बारे में कहा “सिंधिया राजवंश का भारत के इतिहास में अपना एक खास स्थान है। उन्हें मराठों की शक्ति फैलाने और उत्तरी भारत में उनकी ढाल बनने का गौरव प्राप्त था सिंधिया राजवंश पानीपत की लड़ाई में मराठा राज्य को मिले विनाशकारी झटके से उबरने और उसे एक बार फिर से वही महान और गौरवशाली शक्ति बनाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था।”
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा कि “मराठों ने अनेक योग्य पुरुष, राजनेता और योद्धा उत्पन्न किए, जिनमें ग्वालियर के महाराज सिंधिया थे वे शायद ही कभी अपना पद छोड़ते थे और अक्सर मृत्यु का सामना भी अविचलित रहकर करते थे। उत्तर में ग्वालियर के सिंधिया का दबदबा था और वे दिल्ली के बेचारे बादशाह को नियंत्रित करते थे।”