नासा ने एक बार फिर मानव इतिहास मे कुछ अनोखा और वैज्ञानिकी उपलब्धि में उछाल मारके सुर्ख़िया बटोर रहा है। हाल हे में बीती 31 मार्च को नासा ने अपने आर्टेमिस मिशन के रॉकेट को फ्लोरिडा के केप कैनावेरल स्थित केनेडी स्पेस सेंटर से उड़ान भरी।
यह रॉकेट 10 दिन के आर्टेमिस मिशन के तहत चांद की सतह पर नहीं उतरेंगे बल्कि यह अंतरिक्षयान पहले चांद के चक्कर लगाते हुए पृथ्वी से उतनी दूरी पर चल जाएगा जहां आज से पहले कोई भी अन्य देश या मानव नहीं पहुंच सका ।इस मिशन के अंदर तीन अमेरिकी अंतरिक्षयात्री रीड वाइसमैन, क्रिस्टीन कोच, विक्टर ग्लोवर और कनाडाई अंतरिक्षयात्री जेरेमी हेनसेन शामिल हैं।
यह यात्रा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से काफी खास साबित होने वाली है, इस मिशन की सफलता आगे आने वाले निकटतम भविष्य मै मानवरहित मिशन को एक नई दिशा ओर उंचाई देगी। जिसके चलते हम आने वाले समय मै अपने सबसे करीबी उपग्रह चांद पर अपनी एक नई नींव स्थापित कर सकेंगे, जोकि अन्य मिशंस में भी एक बड़ी भूमिका निभाने का काम करेगी। इस आर्टेमिस मिशन की लागत लगभग 93 डॉलर्स बताई जा रही है जिसमें कई सालों के मेहनत और हजारों लोगों के भूमिका स्पष्ट है।
अब यह एक सवाल उभर के आ रहा है कि इसमें नया क्या है, नासा ने आज से 50 दशक पहले भी अपोलो मिशन किया था जिसमें अंतरिक्षयात्री खुद चांद के सतह पर पहेली बार उतरे थे।
6 असफल मिशन के बाद भी , क्यों नहीं रुक रहा अमेरिका ?
इसके जवाब मै हम यही कह सकते है कि चांद के जमीन भले ही देखने मै सुखी धूल भरी ओर बंजर नजर आती हो, लेकिन जमीनी वास्तविक कुछ और ही है। नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम की गृह वैज्ञानिक प्रोफेसर कहती हैं कि चांद सतह पर वही तत्व पाए जाते है जो धरती पर भी है।
वही दूसरी और अंतरिक्ष मै वर्चस्व के लड़ाई भी तेज हो गई है कि कौन सा देश अंतरिक्ष की गहराइयों का आकलन कर उससे जुड़ी हर जानकारी को सांझा कर इस दौड़ मै अज्ञेय निकलेगा। फिलहाल नासा के इस मिशन को सफल रूप देने मै कुछ दिन और शेष है यह जानना रोचक होगा की अंतरिक्ष के उस कक्ष में जा कोई न जा सका वहा नासा कैसे पहुंचा और उसने क्या खोज निकाला।