NEET-UG विवाद और छात्र आंदोलनों के बीच RSS प्रमुख मोहन भागवत का युवाओं के साथ संवाद चर्चा में; Gen Z को भरोसेमंद बताते हुए कहा—विरोध भी लोकतांत्रिक संवाद का एक रूप, लेकिन आंदोलन का लक्ष्य व्यवस्था में सुधार होना चाहिए
नई दिल्ली। देश में युवाओं के बीच शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर जारी असंतोष के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के Gen Z और Gen Alpha के साथ संवाद ने एक नई बहस को जन्म दिया है। 6 अगस्त 2026 को मुंबई में India’s International Movement to Unite Nations (I.I.M.U.N.) के कार्यक्रम में भागवत ने नई पीढ़ी को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं और युवाओं के विरोध को केवल असहमति के रूप में देखने के बजाय उसे संवाद की प्रक्रिया से जोड़ने पर जोर दिया।
भागवत ने कहा कि अगर किसी पीढ़ी पर भरोसा करने की बात हो तो वह Gen Z है। उन्होंने यह भी कहा कि विरोध लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा हो सकता है और युवाओं की जायज मांगों को उठाने के लिए आंदोलन करने मात्र से किसी को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आंदोलन का उद्देश्य किसी व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार और सहमति बनाने की दिशा में होना चाहिए।
NEET विवाद और युवा असंतोष की पृष्ठभूमि
युवाओं के बीच असंतोष की मौजूदा पृष्ठभूमि में प्रतियोगी परीक्षाओं और कथित परीक्षा अनियमितताओं का मुद्दा प्रमुख रहा है। NEET-UG विवाद के बीच दिल्ली समेत कई स्थानों पर छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन हुए। इसी राजनीतिक दबाव के बीच तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई 2026 को अपने पद से इस्तीफा दिया। उनके इस्तीफे की घोषणा के समय उन्होंने छात्रों के हित और परीक्षा व्यवस्था को लेकर पैदा हुई परिस्थितियों का भी उल्लेख किया।
जंतर मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दों में रही थी। ऐसे में मंत्री का इस्तीफा आंदोलन की एक बड़ी राजनीतिक मांग से जुड़ा घटनाक्रम जरूर बना, लेकिन इससे युवाओं से जुड़े सभी सवालों का समाधान हो गया हो, ऐसा कहना मुश्किल है।
मोहन भागवत का संदेश क्या कहता है?
भागवत का हालिया संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने युवाओं की असहमति को सीधे तौर पर राष्ट्रविरोध से जोड़ने से बचने की बात कही। उनके मुताबिक लोकतंत्र में विरोध भी संवाद का एक माध्यम है और जरूरी यह है कि विरोध व्यवस्था में सुधार तथा सहमति निर्माण की दिशा में जाए।
यह रुख उस राजनीतिक बहस से अलग दिखाई देता है जिसमें आंदोलनों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज हो जाते हैं। भागवत ने नई पीढ़ी की सवाल पूछने की प्रवृत्ति को भी स्वीकार किया और इस बात पर जोर दिया कि युवाओं की सोच और उनके सवालों को समझने के लिए लगातार संवाद जरूरी है।
पहली बार नहीं, युवाओं से संवाद पर पहले भी जोर
युवाओं के सवालों और नई पीढ़ी के साथ संवाद पर भागवत पहले भी जोर देते रहे हैं। जुलाई में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि नई पीढ़ी हर बात पर सवाल पूछती है और उसे तर्क के साथ समझाने की जरूरत है। उन्होंने बच्चों और युवाओं को समय देने तथा परिवार में संवाद मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया था।
इन बयानों को मौजूदा युवा असंतोष की पृष्ठभूमि में देखें तो एक संदेश साफ दिखाई देता है—नई पीढ़ी को केवल निर्देश देने के बजाय उसे सुना और समझा जाए।
क्या सिर्फ संवाद से खत्म होगा युवाओं का असंतोष?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल संवाद युवाओं की नाराजगी दूर करने के लिए पर्याप्त होगा?
शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षाओं की विश्वसनीयता, पेपर लीक पर कार्रवाई, समय पर भर्ती, रोजगार और संस्थागत जवाबदेही जैसे सवाल केवल संवाद से हल नहीं होंगे। बातचीत जरूरी है, लेकिन उसके साथ नीतिगत और प्रशासनिक बदलाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
युवा जब किसी आंदोलन का हिस्सा बनते हैं तो उनके पीछे केवल राजनीतिक भावना नहीं होती। कई बार वर्षों की तैयारी, आर्थिक दबाव, रोजगार की चिंता और भविष्य को लेकर असुरक्षा भी उस असंतोष का कारण होती है। इसलिए उनकी समस्याओं का समाधान संवाद + नीति सुधार + समयबद्ध कार्रवाई के संयोजन से ही संभव होगा।
2,000 छात्रों के संवाद का महत्व
I.I.M.U.N. का 2026 चैंपियनशिप कार्यक्रम 6 से 9 अगस्त तक मुंबई में आयोजित हुआ। संगठन के आधिकारिक कार्यक्रम में युवाओं से जुड़े कई विषयों पर चर्चा, नेतृत्व और लोकतांत्रिक संस्थाओं से संबंधित एजेंडा शामिल थे।
इस तरह के मंचों पर नई पीढ़ी को सीधे सार्वजनिक जीवन, लोकतंत्र, नीति और शासन से जुड़े सवाल पूछने का अवसर मिलता है। भागवत का संवाद भी इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें युवाओं से बातचीत को राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रखा गया।
शिक्षा व्यवस्था पर भी उठे सवाल
भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए यह भी संकेत दिया कि शिक्षा के क्षेत्र में जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं हो सकती। समाज और सामाजिक संगठनों को भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका निभानी होगी।
यह दृष्टिकोण उस व्यापक बहस से जुड़ता है जिसमें शिक्षा व्यवस्था को केवल परीक्षा और डिग्री के स्तर पर नहीं, बल्कि कौशल, रोजगार, चरित्र निर्माण और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ देखने की जरूरत महसूस की जा रही है।
शशि थरूर की टिप्पणी से भी सामने आया युवा कनेक्ट का सवाल
इस बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 8 अगस्त को टिप्पणी की कि राहुल गांधी के नेतृत्व वाला ‘छात्रों की गूंज’ अभियान CJP के आंदोलनों जितना प्रभावी ढंग से युवाओं और आम जनता से जुड़ नहीं पाया। उन्होंने कांग्रेस से आत्ममंथन करने को कहा कि युवा वर्ग के साथ पार्टी का संवाद उतना प्रभावी क्यों नहीं रहा।
थरूर पहले भी Gen Z की नाराजगी और CJP आंदोलन को लेकर सार्वजनिक रूप से लिख चुके हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि युवा असंतोष अब केवल सरकार के लिए चुनौती नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों के लिए भी युवा संवाद की परीक्षा बन चुका है।
क्या बदल सकता है युवाओं और सत्ता के बीच संवाद?
युवाओं के असंतोष को केवल आंदोलन या सोशल मीडिया की नाराजगी के रूप में देखने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार और राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि आज की Gen Z पहले की पीढ़ियों की तुलना में सवाल ज्यादा सीधे तरीके से पूछती है और उपलब्ध जानकारी को तुरंत परखने की क्षमता भी रखती है।
ऐसे में संवाद एकतरफा भाषण नहीं, बल्कि दोतरफा बातचीत होना चाहिए। युवाओं को सुना जाए, उनके सवालों का तथ्यात्मक जवाब दिया जाए और जिन शिकायतों में दम है, उन पर समयबद्ध कार्रवाई की जाए।
असली परीक्षा अब कार्रवाई की है
मोहन भागवत का संदेश निश्चित रूप से संवाद और सहमति की जरूरत को रेखांकित करता है। लेकिन युवाओं के असंतोष को स्थायी रूप से कम करने की असली परीक्षा अब नीतियों और संस्थागत सुधारों की होगी।
यदि परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ती है, भर्ती प्रक्रियाएं समय पर होती हैं, पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई होती है और युवाओं को रोजगार तथा शिक्षा से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जवाब मिलते हैं, तो संवाद का भरोसा भी मजबूत होगा।
कुल मिलाकर, युवाओं को सुनना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। विरोध को दबाने के बजाय उसके कारणों को समझना और जायज शिकायतों पर समाधान तलाशना ही लंबे समय में अधिक टिकाऊ रास्ता साबित हो सकता है।
आज का विचार
“युवा सवाल पूछ रहे हैं तो उन्हें चुप कराने के बजाय जवाब देने की जरूरत है; संवाद ही असहमति को समाधान में बदलने का पहला कदम है।”
सांध्य संदेश
Gen Z को केवल वोट बैंक या आंदोलनकारी समूह के रूप में नहीं, बल्कि देश के भविष्य के भागीदार के रूप में देखना होगा। संवाद तभी सार्थक होगा, जब उसके बाद नीतियों और व्यवस्था में दिखाई देने वाला बदलाव भी सामने आए।

