महिला आरक्षण और परिसीमन पर सियासत तेज, SAD के रुख से बढ़ी हलचल; 2029 से पहले बदल सकते हैं राजनीतिक समीकरण

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नई दिल्ली। लोकसभा सीटों के परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) के परिसीमन और महिला आरक्षण के समर्थन के बाद इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक चर्चाएं और बढ़ गई हैं। हालांकि SAD के रुख को फिलहाल किसी नए राजनीतिक गठबंधन का संकेत मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

महिला आरक्षण और परिसीमन का मुद्दा फिर क्यों गरमाया?

संसद ने वर्ष 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए करीब एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि कानून का प्रभावी क्रियान्वयन परिसीमन और उससे जुड़ी संवैधानिक प्रक्रिया से संबंधित है।

इसी वजह से महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों के परिसीमन की बहस एक-दूसरे से जुड़ गई है। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने के विकल्पों पर काम कर रही है, जबकि विपक्षी दल परिसीमन की प्रक्रिया और उसके संभावित राजनीतिक प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

क्या होता है परिसीमन?

परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व का पुनर्गठन है। सामान्य तौर पर इसका आधार जनसंख्या से जुड़ा होता है। भारत में यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इससे विभिन्न राज्यों के लोकसभा प्रतिनिधित्व और राजनीतिक प्रभाव पर असर पड़ सकता है।

खासकर दक्षिणी राज्यों की ओर से यह चिंता सामने आती रही है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। पंजाब को लेकर भी SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल पहले जनसंख्या आधारित परिसीमन पर आपत्ति जता चुके हैं।

SAD के रुख से क्यों बढ़ी राजनीतिक चर्चा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की हालिया मुलाकात के बाद पार्टी ने महिला आरक्षण के साथ परिसीमन को लेकर अपना समर्थन जताया है। यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SAD पहले परिसीमन के कुछ प्रस्तावित तरीकों पर आपत्ति जता चुका था।

हालांकि, भाजपा और SAD के बीच किसी नए औपचारिक गठबंधन की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को फिलहाल नीतिगत मुद्दे पर राजनीतिक रुख में बदलाव के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।

विपक्ष की क्या है चिंता?

महिला आरक्षण के उद्देश्य को लेकर अधिकांश प्रमुख दल समर्थन जताते रहे हैं, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया और उसके तरीके को लेकर राजनीतिक मतभेद हैं। विपक्षी दलों ने पहले भी महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने पर सवाल उठाए हैं और मांग की है कि महिलाओं के लिए आरक्षण को जल्द लागू किया जाए।

यही वजह है कि आने वाले समय में महिला आरक्षण बनाम परिसीमन की बहस केवल संसद तक सीमित रहने के बजाय राज्यों और राजनीतिक दलों के बीच भी बड़ा मुद्दा बन सकती है।

2029 के लोकसभा चुनाव से पहले क्यों अहम है मामला?

2029 का लोकसभा चुनाव इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव हो सकता है। अगर परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर नई संवैधानिक व्यवस्था आगे बढ़ती है, तो इसका असर भविष्य के निर्वाचन क्षेत्रों, सीटों के प्रतिनिधित्व और महिला उम्मीदवारों की राजनीतिक भागीदारी पर पड़ सकता है।

हालिया राजनीतिक चर्चाओं में लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण को 2029 से पहले लागू करने से जुड़े प्रस्ताव भी सामने आए हैं। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम स्वरूप राजनीतिक सहमति और संसद में संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर क्या असर पड़ेगा?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम का मूल उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना है। यदि कानून प्रभावी रूप से लागू होता है, तो भारतीय राजनीति में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है।

हालांकि किन सीटों पर आरक्षण लागू होगा, सीटों का पुनर्गठन कैसे होगा और आरक्षित सीटों का निर्धारण किस प्रक्रिया से किया जाएगा—इन सवालों का जवाब परिसीमन और उससे जुड़ी प्रक्रिया स्पष्ट होने के बाद ही सामने आएगा।

अब आगे क्या?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महिला आरक्षण और परिसीमन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश की सबसे बड़ी राजनीतिक बहस बनेंगे?

आने वाले दिनों में केंद्र सरकार की पहल, संसद में होने वाली चर्चा, विपक्षी दलों की रणनीति और राज्यों की प्रतिक्रिया इस मुद्दे की दिशा तय करेगी। SAD के बदले रुख ने इस बहस को जरूर नया राजनीतिक आयाम दे दिया है, लेकिन इसे किसी नए गठबंधन का संकेत मानने से पहले आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना जरूरी होगा।

सांध्य संदेश

महिला आरक्षण केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र में महिलाओं की निर्णायक भागीदारी से जुड़ा मुद्दा है। वहीं परिसीमन का प्रभाव देश के संघीय राजनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है। इसलिए दोनों विषयों पर व्यापक चर्चा, पारदर्शिता और राजनीतिक सहमति जरूरी है।

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