केरल के सबरीमला मंदिर में महिला के प्रवेश का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। यह मुद्दा धर्म और असमानता को बीच में ला रहा है इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए बड़े-बड़े वेद, पुराण जैसे रामायण, महाभारत आदि पुस्तकें खुल रही है ताकि आने वाले निर्णय से किसी को परेशानी ना आए।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 में पांच जजों की बेंच ने फैसला लिया था कि हर महिला को मंदिर में जाने का अधिकार है इसका कोई उम्र से लेना देना नहीं है हर उम्र की महिला मंदिर में प्रवेश कर सकती है आगे सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को मंदिर के बाहर रखना यह उनके साथ बहुत गलत है और साथ ही अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 21 के अधिकारों का भी उल्लंघन है।
- अनुच्छेद 14 में समानता का अधिकार दिया गया है।
- अनुच्छेद 15 में बिना भेदभाव के अधिकार दिए गए हैं।
- अनुच्छेद 21 में गरिमा के आधार दिए गए हैं।
2018 के बाद भी इस फैसले पर विवाद खत्म नहीं हुआ। दरअसल सबरीमला मंदिर में भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है ऐसे लोगों के मन में श्रद्धा है कि भगवान अयप्पा मोह- माया, कामना और विवाह से दूर रहते हैं और वह तपस्वी रूप में पूछे जाते हैं। इसलिए मासिक धर्म आयु वाली महिलाओं को अयप्पा मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए और ना ही उनकी पूजा करना चाहिए।
लेकिन अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में फिर से खुल गया है अब इस मामले का निर्णय बड़ी संविधान पीठ करेगी। 2018 में पांच जजों की बेंच ने यह निर्णय लिया था लेकिन अब 9 जज या फिर 7 जजो की बेंच मिलकर इस मामले का समाधान निकालेगी।